मंदिरों में मत्था टेककर दिग्गजों ने मांगा जीत का वरदान, नंदीग्राम में नारेबाजी से गर्माया पारा
कोलकाता। विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही सूबे की सियासत सातवें आसमान पर पहुंच गई है। जैसे-जैसे मतदान की तारीखें करीब आ रही हैं, उम्मीदवारों के जनसंपर्क अभियान में श्रद्धा और शक्ति प्रदर्शन का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। रविवार को राज्य के विभिन्न हिस्सों में जहां दिग्गज नेताओं ने मंदिरों में मत्था टेककर जीत का आशीर्वाद मांगा, वहीं नंदीग्राम जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में हुए राजनीतिक टकराव ने चुनावी तपिश को और बढ़ा दिया है। चुनावी समर में उतरे दिग्गजों के लिए रविवार का दिन आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर रहा।
बालीगंज केंद्र से तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर उम्मीदवार शोभन देव चट्टोपाध्याय ने सुबह-सुबह कालीघाट मंदिर पहुंचकर विशेष पूजा-अर्चना की। उन्होंने मां काली के चरणों में शीश नवाकर अपने चुनावी अभियान का विधिवत श्रीगणेश किया। इसी कड़ी में, राज्य की मंत्री और प्रभावी नेत्री शशि पांजा ने भी गिरीश पार्क स्थित इच्छापूर्ति मंदिर में उपस्थिति दर्ज कराई। मंदिर में पूजा के बाद उन्होंने पूरे जोश के साथ क्षेत्र में सघन जनसंपर्क अभियान छेड़ दिया, जो इस बात का संकेत है कि सत्ताधारी दल शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है।
दूसरी ओर, बारानगर के चुनावी रण में भाजपा उम्मीदवार सजल घोष ने आक्रामक रुख अपनाते हुए सीधे जनता की चौखट पर दस्तक दी। सजल घोष ने रविवार को घर-घर जाकर मतदाताओं से सीधा संवाद किया और स्थानीय मुद्दों के आधार पर समर्थन मांगा। उनकी इस जमीनी सक्रियता ने बारानगर के मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। हालांकि, रविवार की सबसे बड़ी खबर चुनावी हॉटस्पॉट नंदीग्राम से आई, जहां माहौल उस वक्त तनावपूर्ण हो गया जब तृणमूल उम्मीदवार पवित्र कर के बयाल स्थित आवास के बाहर भाजपा समर्थकों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने चोर-चोर के नारे लगाकर इलाके की राजनीतिक शांति में खलल डाल दिया।
गौरतलब है कि पवित्र कर कभी भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के बेहद करीबी सिपहसालार हुआ करते थे, लेकिन अब वे विरोधी खेमे से उन्हें चुनौती दे रहे हैं। हैरानी की बात यह रही कि इस हंगामे से कुछ ही समय पहले शुभेंदु अधिकारी ने एक जनसभा में अपने कार्यकर्ताओं को संयम बरतने और विपक्षी उम्मीदवारों के प्रति अमर्यादित टिप्पणी न करने की हिदायत दी थी। बावजूद इसके, शुभेंदु के संदेश के उलट हुए इस शक्ति प्रदर्शन और नारेबाजी ने नंदीग्राम के पुराने जख्मों को फिर से हरा कर दिया है। फिलहाल, पूरे बंगाल में भक्ति, जनसंपर्क और राजनीतिक टकराव का यह त्रिकोण चुनाव को एक बेहद रोमांचक और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर ले आया है।